Sunday, September 21, 2008

एक अनूठा संसार

हमारे घर के पास एक लर्निंग सैन्टर है जहाँ मैं बच्चों को गणित और अंग्रेज़ी पढ़ाती हूँ। बच्चों की उम्र लगभग तीन से पाँच के करीब है। ये प्रोग्राम शाम को चार बजे शुरू होता है। स्कूल से आने के बाद बच्चे जब आते हैं तो कोई नींद से उठ कर आता है तो कोई कराटे की क्लास से लौटा होता है तो कोई पियानो सीखने के बाद आता है। कोई बच्चा थका हारा निढाल सा तो कोई बच्चा इतना हाईपर कि पूरे दिन स्कूल में क्या-क्या बीता, दो मिनट में एक लेखक के समान पूरे दिन की कहानी गढ़ देता है। किसी विषेश पात्र की आवश्यकता नही होती है, बात क्रमबद्ध हो ये भी ज़रूरी नहीं, बस कहना ज़रूरी है। सब कुछ महत्वपूर्ण होता है इसीलिये हर घटना को सूत्र में बाँधना मुश्किल होता है। कोई बदमाशी के मूड में होता है, किसी को इतनी नींद आ रही होती है कि वहीं डैस्क पर सर ढुलका जाता है। इन सब के मासूम चेहरे और हाव-भाव देखने लायक होते हैं, रोनी सूरत, बिखरे बाल, प्यारी सी मुस्कराहट, किसी की कोहनी छिली हुई, किसी की उंगली पर बैंडएड लगा हुआ है, तो कोई सज संवर कर और बाल बड़े तरतीब से बना कर आया है, पता लगा कि आज साहिब का जन्मदिन है। क्रिस की आज हंसी ही नही थमती है। जेसन ठोड़ी पर पैन्सिल टिकाए पेपर पर नज़रें जमाए बैठा है तो बैठा ही है। आदि को आज नया इरेज़र मिला है। अब हर शब्द बार-बार मिटाया जा रहा था और डैस्क का सरफ़ेस कागज़ के बीच में से नज़र आ रहा था। बार-बार बोल कर याद दिलाना पड़ा कि काम खत्म करो।


मैंने हँस कर हैलो की नहीं कि सारी गाथा सुना दी जाती है। लिज़ी के पिताजी काम के सिलसिले में बाहर बहुत रहते हैं, आज वापस आ रहे हैं, लिज़ी अपनी मम्मी और डैड के साथ पार्क जायेगी। अमर के घर में एक छोटा भाई आने वाला है, इसी कारण वो दो महीने के लिये नही आ पायेगा। अमित की दादी इंडिया से आने वाली हैं, वो उन्हे एयेर्पोर्ट लेने जाएगा। मुझे कुछ आता जाता है या नही, इसका बच्चों को भी पता होना चाहिये। एक दिन मुझसे ये प्रश्न पूछा गया कि कैथी की आँखें नीली क्यूँ है ? सरल सा जवाब होगा, माँ बाप की जींस की वजह से, पर मैं गलत थी। कैथी की आँखें नीली इसलिये थी क्योंकि वो ब्लूबैरी बहुत खाती है। राधिका जो वहीं पर बैठी थी वो भी अब ये बताने के लिये उत्सुक थी कि उसकी आँखें काली क्यों हैं। बहुत मासूमियत से बताया गया कि उसको ब्लैकबैरीज़ बहुत अच्छी लगती हैं इसीलिये उसकी आँखें काली हैं।


एलैक्स को गुस्सा ज़रा ज्यादा आता है और मुझे डाँटना भी उसकी अधिकार की सीमा के अंतर्गत ही आता है। मैंने अपना पढ़ाने का दिन बदल लिया था तो एलैक्स को बहुत दिनों से देखा नहीं था। बीच में एक दिन जाना पड़ा तो ऐलैक्स से सामना हुआ, देखते ही झुंझला कर बोले," Where were you for so many days?" जब बताया तो झुंझलाहट में ही बोले," I missed you." इसके आगे आप क्या कह सकते हैं। गर्मी में घास के साथ बहुत सारे डैंडलाईन उग आते हैं, एक किस्म की वीड (मोथा) जिसमें पीले फूल निकलते हैं। केटी इन पीले फूलों के साथ दो तीन जंगली पत्तियाँ ला कर हाथ में देती है और कहती है ये सब मेरे लिये है। वो फूल उसके जाने से पहले मुरझा जाते हैं पर मैं सब बटॊर कर घर ले आती हूँ। जब स्कूल में थी तो हमारी बायोलोजी की टीचर मेरी पसंदीदा टीचर हुआ करती थीं पर मैं कभी भी हिम्मत नहीं जुटा पाई फूल पत्ती देने की। आज जब ये सब बच्चे करते हैं तो बहुत अच्छा लगता है।

Tuesday, September 16, 2008

क्या तुम मुझ से शादी करोगी ?

अरे नहीं ! Nothing Personal here . आप जैसा समझ रहे हैं वैसा नहीं है । वैसे भी जब पत्नी के साथ ब्लौग लिखा जा रहा हो तो ऐसा लिखा भी कैसे जा सकता है ? :-)

बात हो रही है , यहां पर बढते हुए प्रचलन की । मुद्दा यह है कि जब कोई पुरुष अपनी महिला मित्र से शादी के लिये प्रस्ताव रखता है तो वह एक अहं क्षण माना जाता है और यादगार में शामिल हो जाता है । अब इस यादगार दिन को अपनी स्थायी यादों में कैसे जोड़ा जाये ? क्यों न उस यादगार क्षण की एक ’फ़ोटो’ या ’विडियो’ ले लिया जाये ?

कल्पना कीजिये ’बौब’ अपनी होने वाली मंगेतर ’ऐमिली’ को शादी के लिये प्रस्ताव रखने वाला है , उस के द्वारा की गई तैयारी देखिये :

मैक्सिकन रेस्टोरेन्ट (जहां वह दो बरस पहले मिले थे) में रिसर्वेशन
- हो गया .....
सगाई की सुन्दर सी अंगूठी उस के बक्से से निकाल कर पतलून की जेब में सावधानी से छुपाना ।
- हो गया

और अब यह देखिये ....
एक फ़ोटोग्राफ़र जहां आठवी गली और ’ऐस्टर प्लेस’ मिलते हैं , छुप के खड़ा हुआ है । उसे हिदायत है कि जैसे ही ’बौब’ ऐमिली के सामने घुटनों पर झुक कर शादी का प्रस्ताव रखे , वह उस क्षण को अपने कैमरे में उतार ले ।
है ना मज़ेदार बात ।

’बौब’ का कहना है कि वह इस क्षण को ’कैमरे’ में इसलिये कैद करना चाहता है जिस से कि वह अपने मित्रों के साथ इसे बाँट सके । वह अपनी मंगनी के प्रस्ताव के बारे में सिर्फ़ बात ही नहीं करना चाहता बल्कि वह प्रस्ताव कैसे और कहां किया गया , उसे दिखाना भी चाहता है , अपने दोस्तों को और अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों को।

अब यह अपने दिल में उठने वाली कोमल भावनाओं का उबाल समझ लीजिये कि सीधे साधे लोग ’शादी के प्रस्ताव जैसे पवित्र और निजी क्षण को सार्वज़निक बनाना चाह्ते हैं और इसी चक्कर में बेचारे ’फ़ोटोग्राफ़र’ को कभी झाड़ियों के बीच , कभी रैस्टारेन्ट के अंधेरे कोने में , कभी भीड़ में छुपना होता है । उस का काम यही है कि वह होनें वाली मंगेतर के चेहरे पर होने वाली पहली प्रतिक्रिया को ’कैमरे’में सही समय पर कैद कर सके ।

फ़ैशन चला है जिन्दगी के सभी मह्त्वपूर्ण क्षणों को एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह संजो कर रखने का । myspace और facebook में आप को लोगो के द्वारा स्वयं लगाये गये कई बेहद निजी चित्र और ’विडियो’ मिल जायेंगे ।

शादी के समय भी चित्र लेने मे एक नया प्रचलन चला है । वर और वधु के कुछ ऐसे अनौपचारिक चित्र जो उन की जानकारी के बिना लिये गये हों । खाने के समय हर ’मेज’ पर एक disposable camera छोड़ दिया जाता है जिस से कि मेहमान स्वयं अपनी ’मेज’ पर बैठे अन्य मेहमानो के ’स्वाभाविक चित्र’ ले सकें । ऐसे चित्रों का अपना अलग महत्व है । फ़िर उन्हें ’औपचारिक चित्रों’ के साथ मिला कर एक ऐल्बम तैय्यार किया जाता है । इस सब को कुल मिला कर Photojournalistic Realism का भारी भरकम नाम दिया जा रहा है ।


’बौब’ जिस नें अपने इस खूबसूरत क्षण को कैद करने के लिये ’पेशेवर फ़ोटोग्राफ़र’ पर करीब $400 खर्च किये , का कहना है :

"आप जिस महिला से प्यार करते हैं , उस के चित्र पूरी ज़िन्दगी ले सकते हैं लेकिन शादी के प्रस्ताव के समय उस के चेहरे पर आने वाली मुस्कान को दोबारा कैद नहीं कर सकते"


(न्यूयौर्क टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट पर आधारित)

Wednesday, June 11, 2008

उफ़! ये गरमी !



थोड़ी सी छाँव देखकर उसी तरफ़ सरक गई। चिलचिलाती धूप आग के गोले बरसा रही थी। आज का तापमान १०० डिग्री फ़ैरहनाईट के करीब पहुँच गया था। सैंटीग्रेड में देखा जाये तो लगभग ३८ डिग्री होगा । गर्मी से बेहाल, पसीने से तरबितर बर्फ़ की सिल्ली पर लेटने का मन कर रहा था। टी. वी और रेडियो पर Heat Advisory पोस्ट कर रहे थे कि धूप में बाहर मत निकलो और Power Outage यदि हो तो क्या क्या एहतियात बरतनी चाहिये। बड़े बूढ़ों का कैसे ख्याल रखा जाय। दिल्ली की गर्मी याद आई तो लगा ये गर्मी तो कुछ भी नहीं पर सहन करने की सीमा हमारे वातावरण के अनुकूल होती है और अब इतने साल यहाँ रहने के बाद ये भी असहनीय हो गई है।

सर्दी में जब बर्फ़ पड़ती है या मौसम बहुत खराब होता है तब स्कूल के प्रारम्भ में ही स्कूल के कैलेंडर में तीन-चार दिन Snow Day के लिये सुरक्षित होते हैं और मौसम के खराब होते ही वो इस्तमाल कर लिये जाते हैं। अगर बर्फ़ न पड़े और Snow Days का इस्तमाल न किया हो तो बच्चों को कुछ दिन की अप्रत्याशित छुट्टी मिल जाती है । ऐसा ही कुछ इस बार हुआ और हमारी बिटिया नें उसका पूरा आनन्द उठाया । बिना बताये आने वाली छुट्टी का मज़ा ही कुछ और है ।

बात गर्मी की हो रही थी। गर्मी इतनी तेज़ है कि कई स्कूल जो बीस -पच्चीस साल पहले बने थे उन में एअर कन्डिशनर नहीं लगा हुआ है। बच्चों की तबीयत खराब नहीं हो इसीलिये स्कूल से आधे दिन की छुट्टी हो गई है। हमारी स्कूल डिस्ट्रिक्ट में माता-पिता की फ़ोन काल से परेशान हो कर स्कूल की वेब-साईट पर ये कैप्शन था ’We know it's hot out there but schools are still open" अभी तक गर्मी की वजह से कभी स्कूल की यहाँ छुट्टी नहीं हुई है पर अब लगता है कि कुछ Heat Days भी सुरक्षित कर देने चाहिये। घर में बैठ कर ए.सी का मज़ा लिया जाए और पोपसिकल का भी।

Tuesday, March 18, 2008

लायब्रेरी

छुटपन में पत्रिकाओं का पढ़ना, नंदन की परीकथा और चंदामामा की वेताल कथाओं से आरम्भ हुआ था। उसके बाद पराग घर में आई और फिर चाचा चौधरी। दूसरी पत्रिकएँ भी आई पर नंदन, चंदामामा, पराग हमारे यहाँ स्थायी रूप से विद्यमान रहती थीं। हम सब को किताब पढ़ने का बहुत शौक था पर हमारे भाई को पत्रिकाओं पढ़ने का शौक एक जनून की तरह था। एक-एक चंदामामा, नंदन और चाचा-चौधरी बीसीयों बार पढ़ी जाती थीं। कोई भी पत्रिका रद्दी वाले को बेची नही जा सकती थी, धीरे-धीरे पत्रिकाओं का अंबार लग गया था। हमारे घर में एक बहुत पुरानी गोद्रेज की अलमारी थी जहाँ सब पत्रिकाओं को आश्रय मिल गया था। जब किसी भी मेहमान के बच्चे घर आते थे तो उनकी चाँदी हो जाती थी। उसी कमरे में उनकी बैठक जमती थी। पत्रिकाओं का असली मूल्य तभी पता लगता था।

किताब पढ़ने का शौक था इसीलिये पास में पुस्तकालय ढूँढने का प्रयत्न किया गया। एक मिला जो किसी के घर के बाहर के एक छोटे से कमरे में बना हुआ था। यहाँ पर गुलशन नंदा, कर्नल रंजीत, धर्मयुग, पराग, सारिका, कादम्बिनि, सरिता आदि पत्रिकाएँ और किताबें सब उपलब्ध थीं। किताबों की हालत काफ़ी खस्ता रहती थी, उनको पाँच पैसे में किराया पर लिया जा सकता था और दो किताबें ही मिलती थीं। थोड़े दिन में ये शौक भी पूरा हो गया था। स्कूल और कालेज की लायब्रेरी से ही काफ़ी दिन काम चलाया गया

यहाँ पर लायब्रेरी पाँच मिनट की ड्राईव पर है। जब भी जाते हैं, ढेर सारी किताबें उठा लाते हैं। कितनी भी किताबें ले आएँ, कोई पाबंदी नहीं है। हाँ, किताबें लौटाने में देर हो जाए तो फाईन ज़रूर लगता है और खो जाए तो किताब का मोल देना पड़ता है। शुरु शुरु में लालच की वजह से खूब सारी किताबें ले तो आते थे पर अधिकांश बिना पढ़े ही वापस करनी पढ़ती थी। मैं अपनी बिटिया के साथ जब भी जाती थी तो चिकनी किताबों के कवर पर रँग-बिरँगी तस्वीरें बोलती थीं और पता भी नही लगता था पर हाथ में दस-पन्द्रह किताबें जाती थीं। Marcus Pfister की ' The Rainbow Fish", Eric Carle की "Dragons Dragons & other creatures that never were", Shel Silverstein की "The Giving Tree", Leo Leonni, Nancy Tafuri, Arnold Lobel, Tomie dePaola जैसे लेखकों की किताबें हमारी लिस्ट में हमेशा रहती थीं। New York Times की बेस्ट सैलर लिस्ट में से यदि आपको कोई किताब चाहिये और वो लायब्रेरी में नही है तो आप उन्हे बता सकते हैं और पूरा प्रयत्न किया जाता है उसे लाने में। आने पर आप को खबर भी कर दी जायेगी। बच्चों के लिये story telling sessions होते हैं जिसके लिये यहाँ के लेखकों को भी बुलाया जाता है। इस प्रकार लेखक अपनी किताबों का प्रचार कर सकते हैं और किताबों की बिक्री में भी सहायक होती है।

गर्मियों की छुट्टी में बच्चों के लिये Astronomy, Bird Watching, Chess, Arts & Craft, Science से सम्बन्धित activities होती हैं। ये आप के उपर है कि आप इसका कितना लाभ उठाते हैं। बच्चों के लिये Reading challenge होता है। जो सबसे अधिक किताबें पढ़ता है उसे पुरुस्कार दिया जाता है। बड़े लोगों के लिये यहाँ सब प्रकार की सूचनाएँ मिल जाती हैं जैसे टैक्स भरने के लिये भी सहायता मिलती है। शहर में यदि कोई नया आया हो तो उसे स्कूल और कहाँ पर क्या उपलब्ध है,सब जानकारी मिल जाती है। म्यूज़ियम, फ़्लावर शो और नाटक देखने के लिये यातायात का भी प्रबंध किया जाता है। विशेषकरसीनियर सिटिज़न्सको यह सुविधा बहुत अच्छी लगती है लायब्रेरी हर शहर में होती है। किताबों के साथ-साथ लायब्रेरी मनोरंजन विभिन्न सूचनाओं का केन्द्र भी है।
इस क्षेत्र के सब बच्चे लायब्रेरी से जुड़े हुए हैं।बच्चे यहाँ काम में मदद भी कर सकते हैं और हाई स्कूल के विद्यार्थी यहाँ पर छोटे बच्चों की होमवर्क में सहायता करते हैं। ये Homework Helpers के नाम से जाने जाते हैं।


लायब्रेरी इस शहर का अहं हिस्सा है और अनिवार्य भी।

Wednesday, December 5, 2007

सागर के तट पर .....



गरमी के दिन में beach पर ठंडी हवा चल रही थी और पैरों तले जलती रेत ज़मीन पर पाँव ही नही पड़ने दे रही थी. गर्मी से बचने के लिए कुछ लोग ऐटलांटिक महासागर के ठंडे पानी में डुबकी लगा रहे थे और कुछ छतरी के नीचे छाँव और ठंडी हवा का मज़ा ले रहे थे. कुछ दूरी पर छोटे बच्चे गीली रेत से दुर्ग बना रहे थे, दीवारें टूटे हुए सीप और घोंघॆ से बनी हुई थी और गीली लकड़ी बहती हुई किनारे पर आ गई थी उस पर किले का झंडा लहरा रहा था. बस कमी थी तो कुछ सिपाहियों की और राजा-रानी की. किनारे पर आठ दस छोटी छोटी चिड़िया लहरों तक जाती और भाग कर वापस किनारे पर गिरती पड़ती आ जाती. पानी से भीगती हुई रेतीले तट पर पाँवों के निशान छोड़ देती थी और लहरें आकर बालू की स्लेट से उसे मिटा देती थीं। मैं इतनी तन्मयता से उनका ये खेल देख रही थी कि समय का बोध ही नही हुआ. उस समय मालूम नही था कि उनका नाम क्या है? उनका आवास स्थल कहाँ होता है ? आज न्यू योर्क टाईम्स पढ़्ते हुए उनके बारे में लेख देखा जिसमें इन नन्ही चिड़ियाओं का वर्णन था। इनको Piping Plover कहते हैं और ये endangered species के अन्तर्गत आती हैं।

इनका प्राकृतिक वास रेतीला तट होता हैं, वहीं पर ये अपने अंडे सेती हैं। अंडे अठन्नी के बराबर होते हैं। इनका वज़न केवल ५० ग्राम होता है। इनका आवरण प्राकृतिक वास से मिलता-जुलता है, इसी कारण ये बहुत आसानी से पैरों के नीचे या Beach पर चलने वाली गाड़ियों के नीचे आ जाती हैं। सुरक्षा के लिये इनके आवास को रस्सी के दायरे में सुरक्षित किया जाता है, Beach को भी बंद कर दिया जाता है। कुछ लोग को इससे आपत्ति भी होती है पर अब तक ये प्रयास सफ़ल रहा है। बीस साल पहले इन जोड़ों की संख्या ७३२ थी पर अब १,७४३ है। २००० तक की संख्या होते ही ये endangered species नहीं रहेंगे।

छोटी सी ये चिड़िया पानी की लहरों से जब खेलती हैं तो लगता है नन्ही-नन्ही इच्छाएँ इधर-उधर फुदक रही हैं, लहरों तक जाती हैं, उनसे जूझ कर वापस आ जाती हैं। फिर एक बार हिम्मत बटोर कर वापस जाती हैं लहरों से जूझने। प्रयास, ये अनन्त विश्वास का, मन को सुखद अह्सास देता है, अब उसे बचाना चाहिये न।

The Depth
I was washed ashore like the
green sea weed on the supine shore.
The waves tugged my feet
embedded in the sand,
The birds tripped and fell and
came back to the shore,
The sun receding from my body,
slipped through my hand into the ocean.
Deep in there lay the sea shells
my outstretched hand tried to
reach for them but couldn't
reach the ocean floor.
In that depth somewhere,
You were still holding my hand.
__________________

Saturday, October 13, 2007

NELSONS CORNER

दीवार पर नन्हे-नन्हे हाथों ने चित्रकारी करी हुई थी, य़ूँ ही शरारत नहीं की थी पर इन्हे चित्रकारी करने के लिये टाऊनशिप की ओर से लिपी-पुती सफ़ेद दीवार मिली थी। दरअसल यहाँ छोटा सा एक स्ट्रिप माल है, उसे नया बनाने का काम कर रहे थे। जो दुकाने बन रही थी उसके निर्माण कार्य को छुपाने के लिये उस के आगे एक दीवार बनाई थी। दीवार को खूबसूरत बनाने के लिए बच्चों की चित्रकारी की ज़रूरत थी। उससे खूबसूरत और क्या हो सकता है, अब देखिये न, तीन चार आकारों में सारी दुनिया कैद हो जाती है। दीवार पर सूरज गोल दिखाई दे रहा था, घर और खिड़कियाँ चौकोर और छत त्रिकोण, एक पगडंडी जो दो लाईनों में सीमित थी, घर के चौकोर दरवाज़े से निकल कर कागज़ के कोने में लुप्त हो गई थी कहीं। आकाश में कुछ पंछी उड़ते हुए और बच्चे खेलते हुए नज़र आ रहे थे। बच्चों के हाथ-पैर भी चौकोर बने हुए थे और मुँह गोल। थोड़े रंगों में ही सारी दुनिया रंग दी थी, हरे, नीले, पीले, लाल रंगों से बने ये चित्र धूल, मिट्टी, गर्द को बड़ी खूबसूरती से अपने पीछे छिपा लिया था उन्होनें।

सामने ही स्ट्रिप माल है, जिसमें एक ग्रोसरी स्टोर है जहाँ खाने पीने का सब समान मिल जाता है, चौबीस घंटे खुला रहता है । यहाँ भारतीयों की सँख्या कुछ अधिक है इसीलिये यहाँ एक आईल है, जहाँ दाले और मसाले भी मिल जाते हैं। दस साल पहले ये सब मिलना मुश्किल था। उसके लिये कोई देसी स्टोर ढूँढना पड़ता था। आजकल मुंम्बई और दिल्ली जैसे शहर में भी ये स्टोर मिल जाते हैं। एक डालर स्टोर है जहाँ हर चीज़ एक डालर की मिलती है। जो आवश्यक नहीं पर फ़िर भी आवश्यक है,वो चीज़ें मिल जाती हैं जैसे प्लास्टिक के डिब्बे,प्लास्टिक की बाल्टी, मग, सुतली, अखबार की गड्डी बाँधने के लिए, जन्मदिन के लिए रैपिंग पेपर, गुब्बारे, छोटे-छोटे खिलौने जिनको देख कर भारत में खिलौने बेचने वाले की याद आ जाती है जॊ गली के नुक्कड़ तक पहुँचा भी नही होता है, कि पता चला कि चिड़िया जो अभी डंडी पर सन्तुलन बनाए बैठी थी, वो अब ज़मीन पर घायल पड़ी है और आप खाली डंडी को हिला रहे हैं। हालमार्क कार्ड्स की दुकान, ड्राईक्लीनर्स , इंडियन, चाइनीज़, इटेलियन रेस्तरां भी हैं और एक आईसक्रीम की दुकान भी है। ये यहाँ घर से थोड़ी दूर हर कोने में मिल जाते हैं, जैसे दिल्ली में ग्रेटर कैलाश मार्किट, सरोजनी नगर मार्किट, साऊथ एक्स की मार्किट हैं। दिल्ली में जब ये मार्किट बनी थी तब छोटी थी, धीरे-धीरे रेसिडेन्शल एरिया में भी पहूँच गई, यहाँ टाऊनशिप के कानून बहुत कड़े हैं, इसीलिए मार्किट उसी क्षेत्र तक सीमित रहती है। यहाँ अब नई दुकाने बन गई हैं और दीवार जिसपर बच्चों की चित्रकारी थी अब म्यूनिसिपल बिल्डिंग में सहेज के रखी है।

कुछ दिन पहले हम कहीं जा रहे थे और रास्ते में ऐसा ही एक स्ट्रिप माल आया था जिसका नाम Nelsons Corner था। नाम अच्छा लगा था सो ऐसे ही एक कविता बन पड़ी थी, वो यहाँ लिख रही हूँ।

NELSONS CORNER

Nelsons Corner is around the bend,
The bagel's shop on the left,
Walk few steps and starbucks is on the right,
Few chairs and table are outside,
People sitting outside are
Drinking coffee with the sun,
A woman ,
Sure and then unsure of the day ahead,
Sitting with a book rested in her hands,
One page drifts to another,
One dream drifts to another,
The morning is waking up now,
The coffee ,the day and the dream mingles,
One face change to another,
One cup of coffee to another,
Steps are passing by,
Another day,
Nelsons Corner is around the bend.

Saturday, September 15, 2007

खुले आसमान के नीचे ......

सितम्बर का महीना शुरू हो गया है पर अभी तक ठंड पड़ने का नाम ही नहीं ले रही है.रात को हल्की सी ठंड़ हो जाती है पर गर्मी अभी भी अलगनी पर टंकी हुई है। कल जब मैं घर की ओर लौट रही थी तो टप से दो-चार बूँद शीशे पर गिरी और फ़िर तेज़ बौछार ने सब कुछ तर कर दिया। पीछे मुड़ कर देखा तो कुछ दूरी पर सब कुछ सूखा था। ऐसा लगा जैसे बदली का टुकड़ा बादलों की टोली से भटक गया है, उसका पर रस्ता भूलना बहुत अच्छा लगा। उसके जाने के बाद मौसम सुहावना हो गया है।
हमारे घर के पास एक फ़ार्म है जिसे पिछली कई पीढियों से एक परिवार चलाता है। गर्मियों में इन को सुबह पौ फटने से पहले खेतों में काम करते देखा है। जून, जुलाई तक खेत लहलहा उठते हैं। यहाँ की सरकार ने इसे "preserved farmland" घोषित किया हुआ है जिसकी वजह से ये खेती के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा। सरकार की ओर से फ़ार्म को आर्थिक सहायता मिलती है उसे फ़ार्म ही बनाये रखने के लिए। न्यू जर्सी को 'गार्डन स्टेट' कहा जाता है , यहां खेत-खलिहान काफ़ी हैं पर बढ़ती हुई आबादी और विकास कि वजह से खेत धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। state और county का प्रयत्न है कि खेतों और खुली जगह को बचा सकें। इस के कारण प्राकृतिक सुन्दरता रहती है और पानी का संरक्षण होता है । कुछ आर्थिक कारण भी हैं।
इस फ़ार्म में मक्के और फली की खेती होती है, इसके अलावा थोड़े हिस्से में फल और सब्ज़ियाँ भी लगाई जाती हैं। फलों में peach, plum, strawberry, blackberry, rasberry, blueberry और सब्ज़ी में आलू, करेला, खीरा, टमाटर, चौले की फली, फ़्रांस बीन्स और स्ट्रिन्ग बीन्स,बैंगन बैंगनी और सफ़ेद रंग के, छोटे, मोटे ,लम्बे,सब आकार के मिल जाते हैं, हरी मिर्च, लाल मिर्च, पीली मिर्च, मीठी से तीखी तक मिलती हैं। यहां की सब से अच्छी बात है कि आप स्वयं वहाँ जा कर, चुन कर, ताजा सब्जी और फ़ल ला सकते हैं । यदि आप पसीने से तर-बितर न होना चाहे और मच्छरों से बचना चाहें तो वहां पर पहले से तोड़ी हुई सब्जी या फ़ल खरीद सकते हैं । हाँ ! उसके दाम थोड़े ज़्यादा देने पड़ेंगे।
कैथी, खेत की मालकिन हैं, करीब ७० साल की उम्र होगी । देखने से ही लगता है कि वह फ़ार्म पर काम अपनें आत्म संतोष के लिये कर रही है , कोई आर्थिक कारण तो है नहीं क्यों कि फ़ार्म की कीमत ही इतनी होगी कि वह आराम से 'रिटायर' हो सकती हैं । कैथी का फ़ार्म की हर एक सब्जी और फ़ल के प्रति प्यार झलकता है । अनूप दो-चार दिन पहले ढेर सारे मक्के लेने गए थे , कैथी नें अनूप को जब इतने सारे मक्के खरीदते देखा तो स्नेह से पूछा कि इतने सारे मक्को का क्या करोगे? अनूप ने बताया कि हम अगले दिन सुबह एक ग्रुप पिकनिक पर जा रहे हैं, उसके लिये चाहिये। तब उन्होनें अनूप से पूछा कि रात को मक्के रखोगे कहाँ ? अनूप नें जब बताया कि ऐसे ही बाहर रख देंगे तब उन्होनें समझाया कि मक्का को बाहर रखने से अगले दिन ताजा नहीं रहेंगे । उन्होंने अनूप को बताया कि उसके छिलके उतार कर, केवल एक छिलके की परत छोड़ कर फ़्रिज में रख दें तो अगले दिन बिल्कुल ताजा मिलेंगे । ऐसा लगा जैसे मक्के का अगले दिन तक ताजा रहना उन के स्वाभिमान और फ़ार्म की प्रतिष्टा से जुड़ा हो । जब भी आप जाएँ तो आपका मुस्कराहट से स्वागत होता है। आप ने जो भी सब्जी ली बस उन्हे बता दें , पैसे उसी हिसाब से लिये जायेंगे । आप के थैले में सब्जी को कोई गिनेगा नहीं । एक सीधा, सरल सा विश्वास है जो चला आ रहा है । कई पीढियों से यह फ़ार्म चला रहे हैं और नये Builders द्वारा फ़ार्म की बड़ी कीमत दिये जाने वाले प्रलोभनो से अपने को बचाये हैं । आस पास कई मकानों के नये developments आ गये हैं लेकिन यह फ़ार्म अभी भी १९१५ से वैसा का वैसा ही है । फ़ार्म चलाने का उद्देष्य ज़रूरत से ज़्यादा, इन का खेती से लगाव है। आर्थिक दृष्टी से ये सम्पन्न हैं और इन्हें कड़ी मेहनत करने की कोई आवश्यकता नहीं है ।
गर्मी के मौसम में टमाटर वहीं से लाती हूँ। जो स्वाद मौसम की सब्ज़ी का होता है वो बिन मौसम के फल और सब्ज़ी का नहीं होता जो 'सुपर मार्केट' मे मिलती है । 'सुपर मार्केट' में हर सब्जी देखनें में तो बहुत सुन्दर लगती है लेकिन पता नहीं कितनें दिन पहले की तोड़ी गई है और फ़िर न जानें उस पर कितनें 'केमिकल्स' का छिड़काव हुआ है । खेत से ताजा सब्जी तोड़ने का अपना ही आनन्द है, इस बहाने थोड़ी कसरत भी हो जाती है (जो इस देश में बड़ी मुश्किल से और प्रयास करने पर ही हो पाती है) ।
अब टमाटर का मौसम जाने वाला है। बारिश होने के बाद जो टमाटर पौधों पर लदे हुए थे, आज सब ज़मीन पर बिखरे पड़े थे। मन कर रहा था सभी उठा कर ले आऊँ। वहाँ से जब भी गुज़रती हूँ, हमारे शहर का सबसे सुँदर हिस्सा वो ही लगता है। यहाँ खुले आसमान के नीचे दूर-दूर तक धरती ही धरती दिखाई देती है। प्रत्येक मौसम का रँग अलग होता है। सर्दी में धरती बर्फ़ से ढकी सफ़ेद चादर में लिपटी रहती है। गर्मी में खेत की हरियाली धरती की तपस हर लेती है और पतझड़ में आसमान धरती का रँग चुरा लेता है, धरती पर जहाँ फ़सल पीली और भूरी होनी शुरू हो जाती है वहीं साँझ आसमान का रँग गुलाबी, सागर सा गहरा नीला, बैंगनी और इन्द्रधनुषी हो जाता है।
ये हमारे छोटे से शहर के छोटे से फ़ार्म का परिचय है। कभी आप हमारे घर आयेंगे तो आप को फ़ार्म की सैर ज़रूर करवायेंगे ।
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चित्र - अनूप भार्गव
लेखन - रजनी भार्गव , अनूप भार्गव