Tuesday, March 18, 2008

लायब्रेरी

छुटपन में पत्रिकाओं का पढ़ना, नंदन की परीकथा और चंदामामा की वेताल कथाओं से आरम्भ हुआ था। उसके बाद पराग घर में आई और फिर चाचा चौधरी। दूसरी पत्रिकएँ भी आई पर नंदन, चंदामामा, पराग हमारे यहाँ स्थायी रूप से विद्यमान रहती थीं। हम सब को किताब पढ़ने का बहुत शौक था पर हमारे भाई को पत्रिकाओं पढ़ने का शौक एक जनून की तरह था। एक-एक चंदामामा, नंदन और चाचा-चौधरी बीसीयों बार पढ़ी जाती थीं। कोई भी पत्रिका रद्दी वाले को बेची नही जा सकती थी, धीरे-धीरे पत्रिकाओं का अंबार लग गया था। हमारे घर में एक बहुत पुरानी गोद्रेज की अलमारी थी जहाँ सब पत्रिकाओं को आश्रय मिल गया था। जब किसी भी मेहमान के बच्चे घर आते थे तो उनकी चाँदी हो जाती थी। उसी कमरे में उनकी बैठक जमती थी। पत्रिकाओं का असली मूल्य तभी पता लगता था।

किताब पढ़ने का शौक था इसीलिये पास में पुस्तकालय ढूँढने का प्रयत्न किया गया। एक मिला जो किसी के घर के बाहर के एक छोटे से कमरे में बना हुआ था। यहाँ पर गुलशन नंदा, कर्नल रंजीत, धर्मयुग, पराग, सारिका, कादम्बिनि, सरिता आदि पत्रिकाएँ और किताबें सब उपलब्ध थीं। किताबों की हालत काफ़ी खस्ता रहती थी, उनको पाँच पैसे में किराया पर लिया जा सकता था और दो किताबें ही मिलती थीं। थोड़े दिन में ये शौक भी पूरा हो गया था। स्कूल और कालेज की लायब्रेरी से ही काफ़ी दिन काम चलाया गया

यहाँ पर लायब्रेरी पाँच मिनट की ड्राईव पर है। जब भी जाते हैं, ढेर सारी किताबें उठा लाते हैं। कितनी भी किताबें ले आएँ, कोई पाबंदी नहीं है। हाँ, किताबें लौटाने में देर हो जाए तो फाईन ज़रूर लगता है और खो जाए तो किताब का मोल देना पड़ता है। शुरु शुरु में लालच की वजह से खूब सारी किताबें ले तो आते थे पर अधिकांश बिना पढ़े ही वापस करनी पढ़ती थी। मैं अपनी बिटिया के साथ जब भी जाती थी तो चिकनी किताबों के कवर पर रँग-बिरँगी तस्वीरें बोलती थीं और पता भी नही लगता था पर हाथ में दस-पन्द्रह किताबें जाती थीं। Marcus Pfister की ' The Rainbow Fish", Eric Carle की "Dragons Dragons & other creatures that never were", Shel Silverstein की "The Giving Tree", Leo Leonni, Nancy Tafuri, Arnold Lobel, Tomie dePaola जैसे लेखकों की किताबें हमारी लिस्ट में हमेशा रहती थीं। New York Times की बेस्ट सैलर लिस्ट में से यदि आपको कोई किताब चाहिये और वो लायब्रेरी में नही है तो आप उन्हे बता सकते हैं और पूरा प्रयत्न किया जाता है उसे लाने में। आने पर आप को खबर भी कर दी जायेगी। बच्चों के लिये story telling sessions होते हैं जिसके लिये यहाँ के लेखकों को भी बुलाया जाता है। इस प्रकार लेखक अपनी किताबों का प्रचार कर सकते हैं और किताबों की बिक्री में भी सहायक होती है।

गर्मियों की छुट्टी में बच्चों के लिये Astronomy, Bird Watching, Chess, Arts & Craft, Science से सम्बन्धित activities होती हैं। ये आप के उपर है कि आप इसका कितना लाभ उठाते हैं। बच्चों के लिये Reading challenge होता है। जो सबसे अधिक किताबें पढ़ता है उसे पुरुस्कार दिया जाता है। बड़े लोगों के लिये यहाँ सब प्रकार की सूचनाएँ मिल जाती हैं जैसे टैक्स भरने के लिये भी सहायता मिलती है। शहर में यदि कोई नया आया हो तो उसे स्कूल और कहाँ पर क्या उपलब्ध है,सब जानकारी मिल जाती है। म्यूज़ियम, फ़्लावर शो और नाटक देखने के लिये यातायात का भी प्रबंध किया जाता है। विशेषकरसीनियर सिटिज़न्सको यह सुविधा बहुत अच्छी लगती है लायब्रेरी हर शहर में होती है। किताबों के साथ-साथ लायब्रेरी मनोरंजन विभिन्न सूचनाओं का केन्द्र भी है।
इस क्षेत्र के सब बच्चे लायब्रेरी से जुड़े हुए हैं।बच्चे यहाँ काम में मदद भी कर सकते हैं और हाई स्कूल के विद्यार्थी यहाँ पर छोटे बच्चों की होमवर्क में सहायता करते हैं। ये Homework Helpers के नाम से जाने जाते हैं।


लायब्रेरी इस शहर का अहं हिस्सा है और अनिवार्य भी।

4 comments:

सुजाता said...

वाह ! बहुत खूब ! जानकर अच्छा लगा । बच्चों में लाइब्रेरी के प्रति लगाव और रीडिन्ग हैबिट विकसित करना वाकई बहुत ज़रूरी है । काश यहाँ बच्चे गर्मियों की छुट्टियों में पोकिमॉन ,शिंचैन वगैरह देखने और मॉल्स में घूमने की बजाय ऐसी रचनात्मक गतिविधियों में लग पाएँ ।

mahendra mishra said...

जानकर अच्छा लगा

Renu said...

Yes this is a very good facility in US, most of the communities have full fledged libraries and many Indain writers are also available here.
Now in India also reading is getting more popular, whever i go to Landmark, I find good crowd over there.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

अनूप जी, मैं तो इस व्यवस्था का कायल हूं. असल में मेरा अमरीका प्रवास तो सुखद ही इस व्यवस्था के कारण हुआ. पता नहीं, भारत में भी कभी ऐसा हो पायेगा? शायद हमारी ज़िन्दगी में तो नहीं. यहां तो जैसी भी लाइब्रेरी व्यवस्था थी, वह और भी खराब होती जा रही है.