चारों ओर मौसम की पहली बर्फ़, धवल, सफ़ेद, उजली चादर सी फैली हुई थी। रूई के फोहे की तरह बर्फ़ घर की छतों पर और सड़क पर बिछी हुई थी। सुबह, सूरज की रोशनी के बिना ही बर्फ़ के उजाले से चमक रही थी। बर्फ़ पर अभी किसी के पैरों के निशान या कार के टायर के निशान नहीं बने थे। हाँ क्यारी के पास खरगोश और चिड़िया के पाँव के निशान दिखाई दे रहे थे। टहनी पर बैठी चिड़िया ने जब अपने पँख फड़फड़ाए तो बर्फ़ नीचे धप्प से गिर गई और दूसरी चिड़िया लाल बैरी खाती हुई वहाँ से उड़ कर दूसरी ओर बैठ गई।

ठंड़ किस तंह में दुबकी हुई थी, पता नही लग रहा था। स्नोमैन के पैरों में थी या उसकी नाक पर बैठी हुई थी, या फिर टहनी पर टिकी हुई थी, हवा से झर कर नीचे ज़मीन पर पड़ी हुई थी। हो सकता है उन बच्चों के हाथ में हो जो स्नोबाल बना कर एक दूसरे पर फेंक रहे थे। छत के कँगूरे पर आईसिकल्स लटक रही थीं, लगा उसी में है, जब सूरज निकलेगा और बूँद टपकेगी तब बाहर निकलेगी।
मैं कमरे में शाल में लिपटी हुई, ठँड को बाहर ढूँढ रही थी। अन्दर fireplace में लकड़ियाँ जल रही थीं, मैं अलाव पर हाथ तप रही थी और पास में गर्म-गर्म चाय का कप रखा हुआ था, कुछ किताबें जो पन्नों में गर्म अहसास लिए पास रखी हुई थी। ऐसे में ठँड किसे नही अच्छी लगती।
7 comments:
bahot sundar drashya prastut kiya hai aapne...
Beautiful photographs.
चलिये मौसम की पहली बर्फ ने आप से इत्ता सुँदर लिखवा तो दिया :)
Enjoy the remaining Year & Hope you have a wonderful 2009 ahead Rajni bhabhi ji
- लावण्या
सोनी जी,
बहुत उम्दा ।
मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है - आत्मिवश्वास से जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-
http://www.ashokvichar.blogspot.com
आप की इस पर कविता होनी थी भाभी।
kya burf ke mausam main mushkil nahi hoti
हमने पहली बारिश देखी है ....
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